शनिवार 13 जून 2026 - 10:02
क्या हज़रत महदी (अ) के ज़ुहूर के बाद काफ़िरों को तौबा का अवसर मिलेगा?

ज़ुहूर और क़याम के चरण में अंतर है। पहले चरण में हज़रत महदी (अ) चमत्कारों और तर्कों के माध्यम से सभी लोगों को इस्लाम की ओर आमंत्रित करेंगे और तौबा का द्वार खुला रहेगा। लेकिन जो लोग इस चरण के अंत तक ईमान नहीं लाएँगे और अपने पापों पर अड़े रहेंगे, उनके लिए जब हज़रत की तलवार के साथ सामना होगा, तब भय या विवशता में की गई उनकी तौबा स्वीकार नहीं की जाएगी।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, ज़ुहूर के युग के बारे में एक प्रचलित शंका यह है कि उस समय तौबा का दरवाज़ा बंद हो जाएगा और गुनाहगारों तथा काफ़िरों का ईमान स्वीकार नहीं किया जाएगा। कुछ रिवायतों में क्यों कहा गया है कि हज़रत महदी (अ) लोगों को तौबा का अवसर दिए बिना कठोर कार्रवाई करेंगे? धार्मिक प्रश्नों के उत्तर देने वाले विशेषज्ञों ने क़ुरआन और रिवायतों के आधार पर "ज़ुहूर" और "क़याम" के चरणों में अंतर स्पष्ट करते हुए इस शंका का उत्तर दिया है।

प्रश्न: क्या हज़रत महदी (अ) के ज़ुहूर हो जाने के बाद गुनाहगारों और काफ़िरों की तौबा स्वीकार की जाएगी? कुछ रिवायतों में क्यों आया है कि उस समय इमाम ज़माना (अ) न तो लोगों को तौबा की ओर बुलाएँगे और न ही किसी की तौबा स्वीकार करेंगे, बल्कि हर व्यक्ति को उसके पूर्व कर्मों का परिणाम देंगे? जब लोग अभी जीवित होंगे और दुनिया में रह रहे होंगे, तो फिर उनके लिए तौबा का अवसर क्यों समाप्त हो जाएगा?

उत्तर: रिवायतों के अनुसार, आख़िरुज़्ज़माँ और इमाम ज़माना (अ) के ज़ुहूर से पहले का समय मानवता की अव्यवस्था, धार्मिक और नैतिक पतन का युग होगा और धरती अत्याचार तथा भ्रष्टाचार से भर जाएगी। इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए यह प्रश्न उठता है कि हज़रत इतनी बड़ी आबादी के साथ किस प्रकार व्यवहार करेंगे? क्या वे गुनाहगारों का मार्गदर्शन करेंगे और तौबा का दरवाज़ा खुला रहेगा तथा अंततः उनकी तौबा स्वीकार होगी? या फिर गुनाहगारों का समय समाप्त हो चुका होगा, तौबा का द्वार बंद हो जाएगा और हज़रत पापियों को मोमिनों से अलग कर देंगे?

इस विषय में प्राप्त रिवायतें विभिन्न प्रकार की हैं और इन प्रश्नों का सही उत्तर देने के लिए उनका उचित विश्लेषण आवश्यक है। इस संबंध में कुछ महत्वपूर्ण बिंदु प्रस्तुत हैं।

पहला बिंदु: तौबा और उसकी स्वीकृति की शर्तें

पवित्र क़ुरआन में बहुत सी आयतें हैं जो स्पष्ट रूप से तौबा के लाभकारी होने का उल्लेख करती हैं।(1)

कुछ अन्य आयतों में तौबा की स्वीकृति के लिए कुछ शर्तें बताई गई हैं, जैसे कि अभी अल्लाह का अज़ाब प्रकट न हुआ हो, तौबा सच्ची हो, व्यक्ति पाप को जारी न रखे और मृत्यु के लक्षण प्रकट न हुए हों।(2)(3)

यदि तौबा इन शर्तों के साथ हो तो वह निश्चित रूप से स्वीकार की जाएगी। लेकिन यदि इनमें से कोई शर्त पूरी न हो तो यह इस बात का संकेत है कि तौबा वास्तविक नहीं है, बल्कि केवल दंड से बचने के लिए की जा रही है। ऐसी तौबा व्यक्ति के लिए लाभदायक नहीं होगी, क्योंकि क़ुरआन के अनुसार यदि ऐसे व्यक्ति को दोबारा अवसर दिया जाए तो वह फिर अपने पुराने कर्मों की ओर लौट जाएगा।(4)

स्पष्ट है कि वे आयतें जो हर तौबा की स्वीकृति की बात करती हैं और वे आयतें जो तौबा की स्वीकृति को कुछ शर्तों से जोड़ती हैं, एक-दूसरे के विरोध में नहीं हैं। बल्कि दूसरी श्रेणी की आयतें पहली श्रेणी की आयतों का सही अर्थ स्पष्ट करती हैं।

दूसरा बिंदु: आख़िरुज़्ज़माँ में तौबा की स्वीकृति

ज़ुहूर के युग से संबंधित रिवायतों का पहला समूह यह बताता है कि हज़रत महदी (अ) के समय भी तौबा का अवसर रहेगा और उसका दरवाज़ा बंद नहीं होगा। क्योंकि हज़रत का सार्वभौमिक आह्वान लोगों को सत्य की ओर लौटाने के लिए होगा, और यह स्वयं तौबा का अवसर माना जाएगा। यदि तौबा का द्वार बंद होता तो यह आमंत्रण निरर्थक होता।

कई रिवायतें बताती हैं कि हज़रत सभी लोगों को — चाहे वे नासिबी हों, सुफ़यानी के अनुयायी हों या विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के लोग — सत्य की ओर बुलाएँगे।(5)

उदाहरण के लिए, इमाम मूसा काज़िम (अ) ने फ़रमाया:

"जब क़ायम ज़ुहूर करेंगे तो वे यहूदियों, ईसाइयों, सितारा-पूजकों, नास्तिकों, धर्मत्यागियों और धरती के पूर्व तथा पश्चिम के सभी काफ़िरों के सामने इस्लाम प्रस्तुत करेंगे। जो स्वेच्छा से इस्लाम स्वीकार करेगा, उसे नमाज़ और ज़कात का आदेश दिया जाएगा।" (6)

एक अन्य रिवायत में आया है:

"अल्लाह उन सभी चमत्कारों के समान चमत्कार हमारे क़ायम के हाथों प्रकट करेगा जो उसने अपने नबियों और उनके उत्तराधिकारियों को दिए थे, ताकि विरोधियों पर अंतिम प्रमाण पूरा हो जाए।" (7)

स्पष्ट है कि चमत्कार का उद्देश्य मार्गदर्शन और सत्य को स्वीकार करने का अवसर देना होता है। यदि तौबा का द्वार बंद होता तो चमत्कारों की आवश्यकता ही न रहती।

इस प्रकार ये रिवायतें क़ुरआन के उस सामान्य सिद्धांत के अनुरूप हैं जिसके अनुसार तौबा का द्वार समय और स्थान की परवाह किए बिना हमेशा खुला रहता है, बशर्ते उसकी आवश्यक शर्तें पूरी हों। इसलिए इमाम महदी (अ) का ज़ुहूर स्वयं तौबा की अस्वीकृति का कारण नहीं है।

तीसरा बिंदु: तौबा अस्वीकार किए जाने के कारण

हज़रत द्वारा तौबा स्वीकार न किए जाने से संबंधित रिवायतें भी दो प्रकार की हैं।

पहला प्रकार उन रिवायतों का है जिनमें कहा गया है कि हज़रत लोगों से तौबा की मांग नहीं करेंगे। यद्यपि इनमें तौबा की ओर न बुलाने का उल्लेख है, लेकिन यह नहीं कहा गया कि यदि कोई सच्ची तौबा करे तो वह स्वीकार नहीं होगी। इसके अतिरिक्त इन रिवायतों की सनद भी कमज़ोर मानी गई है और इसलिए उन पर पूर्ण भरोसा नहीं किया जा सकता।

दूसरा प्रकार उन रिवायतों का है जिनमें कुछ गुमराह लोगों की तौबा स्वीकार न होने की बात कही गई है। इनका आशय यह है कि जब अल्लाह की कुछ विशेष निशानियाँ प्रकट हो जाएँगी और कुछ लोगों पर इलाही दंड उतर आएगा, तब उनकी तौबा या ईमान उन्हें लाभ नहीं देगा। इसी प्रकार जो लोग पहले से ईमान रखते थे लेकिन उन्होंने कोई अच्छा कर्म नहीं किया था, उनके लिए भी उस समय का ईमान लाभकारी नहीं होगा।

यह अर्थ सूर ए अनआम की आयत 158 के अनुरूप है, जिसमें कहा गया है:

"जिस दिन तुम्हारे रब की कुछ निशानियाँ प्रकट हो जाएँगी, उस दिन किसी व्यक्ति का ईमान उसके लिए लाभदायक नहीं होगा यदि उसने पहले ईमान न लाया हो या अपने ईमान के माध्यम से कोई भलाई अर्जित न की हो।" (8)

इस आयत की व्याख्या में आई रिवायतों के अनुसार मृत्यु का निकट आ जाना, अज़ाब का आ जाना और काफ़िराना मानसिकता का पक्का हो जाना ऐसे कारण हैं जो तौबा की स्वीकृति में बाधा बनते हैं। यह सब क़ुरआन के सामान्य सिद्धांतों के अनुरूप है।

चौथा बिंदु: ज़ुहूर और क़ियाम के चरणों का अंतर

इन रिवायतों में दिखाई देने वाले विरोधाभास को दूर करने का सबसे उचित तरीका यह है कि इमाम महदी (अ) के ज़ुहूर और उनके सशस्त्र क़ियाम के बीच अंतर किया जाए।

ज़ुहूर का चरण मार्गदर्शन, जागरूकता और सत्य के प्रचार का समय होगा, जबकि सशस्त्र क़याम उसके बाद आएगा। पहले चरण में हज़रत पूरी शक्ति के साथ लोगों को सत्य की ओर बुलाएँगे और उन्हें सोचने तथा निर्णय लेने का अवसर देंगे। इस चरण के अंत में सत्य और असत्य की शक्तियाँ अलग-अलग हो जाएँगी और दोनों मोर्चों के बीच अंतिम संघर्ष शुरू होगा।

यदि कोई व्यक्ति उस समय, जब हज़रत की तलवार सामने हो और मृत्यु या दंड का भय स्पष्ट हो, ईमान लाने या तौबा करने का दावा करे, तो वह वास्तविक तौबा नहीं मानी जाएगी। क्योंकि उस समय इलाही निशानियाँ पूरी तरह प्रकट हो चुकी होंगी और तौबा का अवसर समाप्त हो चुका होगा।

इस प्रकार यदि तौबा के बंद होने को सशस्त्र क़याम के चरण से संबंधित माना जाए तो सभी रिवायतें एक-दूसरे के साथ संगत हो जाती हैं।

इसके बावजूद हज़रत के मार्गदर्शन और प्रचार के चरण में बहुत बड़ी संख्या में लोग ईमान ले आएँगे और दुनिया के अधिकांश लोग अपनी शुद्ध फ़ितरत के आधार पर उनकी पुकार का उत्तर देंगे।

रिवायतों में आया है:

"कोई काफ़िर ऐसा नहीं बचेगा जो ईमान न ले आए और कोई बुरे कर्मों वाला ऐसा नहीं रहेगा जो अच्छाई की ओर न लौट आए।" (9)

नतीजा

इस चर्चा का नतीजा यह है कि हज़रत महदी (अ) सशस्त्र क़याम से पहले समस्त मानवता के लिए एक व्यापक और सार्वभौमिक आह्वान करेंगे। जो लोग इस आह्वान को स्वीकार करेंगे, ईमान लाएँगे और तौबा करेंगे, वे सफल होंगे। लेकिन जो लोग सत्य के स्पष्ट हो जाने के बाद भी अपने पापों और गुमराही पर अड़े रहेंगे, वे हज़रत के क़याम का सामना करेंगे। उस समय भय, दंड या मृत्यु के डर से की गई तौबा वास्तविक नहीं होगी और स्वीकार नहीं की जाएगी।

इस प्रकार क़ुरआन का सामान्य सिद्धांत और संबंधित रिवायतें एक-दूसरे के अनुरूप हैं, और इनमें कोई वास्तविक विरोधाभास नहीं पाया जाता।

स्रोत

  1. सूर ए मायदा, आयत 39; सूर ए अनआम, आयत 54; सूर ए ज़ुमर, आयत 53।
  2. सूर ए ग़ाफ़िर, आयत 44-45।
  3. सूर ए निसा, आयत 17-18।
  4. सूर ए अनआम, आयत 28।
  5. पेज 227, रिवायत 288; अय्याशी, मुहम्मद बिन मसऊद, तफ़सीर अल-अय्याशी; कुलैनी, मुहम्मद बिन याक़ूब, अल-रौज़ा मिन अल-काफ़ी; अय्याशी, भाग 2, पेज 60; कौरानी अली व अन्य, “मु'जम अहादीस अल-इमाम अल-महदी (अ)”, भाग 5, पेज 176; क़ुम्मी, अली बिन इब्राहीम, तफ़सीर क़ुम्मी, भाग 1, पेज 158; नौमानी, मुहम्मद बिन इब्राहीम, अल-ग़ैबा, पेज 317, अध्याय 21, रिवायत 1।
  6. अय्याशी, मुहम्मद बिन मसऊद, तफ़सीर अल-अय्याशी, भाग 1, पेज 183, रिवायत 82।
  7. कौरानी, अली व अन्य, “मु'जम अहादीस अल-इमाम अल-महदी (अ)”, भाग 3, पेज 380।
  8. सूर ए अनआम, आयत 158।
  9. मजलिसी, मुहम्मद बाक़िर, बिहार उल अनवार, भाग 44, पेज 21।

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